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ASHOKKOHALI

ASHOKKOHALI जीवन के कुसुमित उपवन में गुंजित मधुमय कण-कण होगा शैशव के कुछ सपने होंगे मदमाता-सा यौवन होगा यौवन की उच्छृंखलता में पथ भूल न जाना पथिक कहीं। पथ में काँटे तो होंगे ही दूर्वादल, सरिता, सर होंगे सुंदर गिरि, वन, वापी होंगी सुंदर सुंदर निर्झर होंगे सुंदरता की मृगतृष्णा में पथ भूल न जाना पथिक कहीं! मधुवेला की मादकता से कितने ही मन उन्मन होंगे पलकों के अंचल में लिपटे अलसाए से लोचन होंगे नयनों की सुघड़ सरलता में पथ भूल न जाना पथिक कहीं! साक़ीबाला के अधरों पर कितने ही मधुर अधर होंगे प्रत्येक हृदय के कंपन पर रुनझुन-रुनझुन नूपुर होंगे पग पायल की झनकारों में पथ भूल न जाना पथिक कहीं! यौवन के अल्हड़ वेगों में बनता मिटता छिन-छिन होगा माधुर्य्य सरसता देख-देख भूखा प्यासा तन-मन होगा क्षण भर की क्षुधा पिपासा में पथ भूल न जाना पथिक कहीं! जब विरही के आँगन में घिर सावन घन कड़क रहे होंगे जब मिलन-प्रतीक्षा में बैठे दृढ़ युगभुज फड़क रहे होंगे तब प्रथम-मिलन उत्कंठा में पथ भूल न जाना पथिक कहीं! जब मृदुल हथेली गुंफन कर भुज वल्लरियाँ बन जाएँगी जब नव-कलिका-सी अधर पँखुरियाँ भी संपुट कर जाएँगी तब ...